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    What is Projector | प्रोजेक्टर क्‍या है:-

    हमने कई बार प्रोजेक्‍टर का नाम सुना है, उपयोग होते हुए देखा है। तब हमें जानने की इच्‍छा होती है कि प्रोजेक्‍टर क्‍या है | What is Projector

    जब हमें आउटपुट डाटा को प्रजेंटेंशन के रूप में प्रदर्शित करना होता है, तब प्रोजेक्टर का उपयोग किया जाता है।

    इसके द्वारा कम्प्यूटर के आउटपुट को एक बड़ी स्क्रीन अथवा सफेद पर्दे या सफेद दीवार पर दिखाया जाता है, जिससे अधिक लोगो द्वारा देखा जा सके।

    इसका उपयोग देखने योग्य किसी भी प्रकार के डाटा को आउटपुट करने के लिए किया जा सकता है।

    प्रोजेक्टर का आकार बहुत छोटा होता है, जिसके कारण इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर आसानी से ले जाया जा सकता है।

    इन्हें आसानी से कम्प्यूटर से कनेक्ट किया जा सकता है।

    कम्प्यूटर से कनेक्ट करने के आधार पर प्रोजेक्टर दो प्रकार के होते हैः-

    • वायर्ड प्रोजेक्टर | Wired Projector:- इस प्रकार के प्रोजेक्टर को कम्प्यूटर से कनेक्ट करने हेतु वी.जे.ए. अथवा एच.डी.एम.आई पोर्ट एवं केबल का उपयोग किया जाता है।
    • वायरलेस प्रोजेक्टर | Wireless Projector | Bluetooth Projector:- वर्तमान में प्रोजेक्टर के एडवांस वर्जन आने लगे है, जिसे कम्प्यूटर से वाई-फाई अथवा ब्लू-टूथ के माध्यम से कनेक्ट किया जा सकता है।

    प्रोजेक्टर में उपयोग होने वाली टैक्नोलॉजी के आधार पर प्रोजेक्टर के प्रकारः-

    प्रोजेक्टर के प्रारंभिक विकास से लेकर वर्तमान तक प्रोजेक्टर में आउटपुट को प्रोजेक्ट करने के लिए अलग-अलग टैक्नोलॉजी 

    जैसे सी.आर.डी., एल.सी.डी., डी.एल.पी. आदि का उपयोग हुआ।

    इसके बारे में हम एक-एक कर जानते हैः-

    1. सी.आर.डी. अथवा कैथोड रे डिस्प्ले प्रोजेक्टर | Cathode Ray Display Projector:-

    इस प्रकार के प्रोजेक्टर में कैथोड रे डिस्प्ले का उपयोग इमेज को जनरेट करने के लिए किया जाता है।

    इसमें सी.आर.टी. के सामने एक लेंस लगा होता है, 

    जो सी.आर.टी. से निकलने वाली लाईट को एक जगह फोकस करता है, तथा बड़ी स्क्रीन पर उसे दिखाता है।

    यह केवल एक ही कलर में भी आता है तथा इसका एडवांस वर्जन एक से अधिक कलर को भी स्क्रीन पर दिखा सकता है।

    यह प्रोजेक्टर बिजली की अधिक खपत करता है 

    साथ ही इसका आकार भी बहुत बडा होता है, जिससे इनका वजन भी अधिक होता है।

    इसकी इमेज क्वालिटी अच्छी होती है। 

    वर्तमान में कई नई टैक्नोलॉजी के आने से इसका प्रयोग बहुत कम या कहे नहीं किया जाता है।

    2.3.2 एल.सी.डी. अथवा लिक्विड क्रिस्टल डिस्प्ले प्रोजेक्टर | LCD Projector:-

    इसमें एल.सी.डी. का उपयोग किया जाता है। 

    इस प्रकार के प्रोजेक्ट का आकार बहुत छोटा होता है, जिससे इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना आसान होता है।

    इसमें आउटपुट को डिस्प्ले करने के लिए लिक्विड क्रिस्टल का उपयोग होता है।

    इसके द्वारा प्रोजेक्शन करने पर आउटपुट की कलर क्वालिटी बहुत अच्छी होती है 

    साथ ही इसकी कीमत भी कम होती है।

    इसका उपयोग सामान्यतः प्रजेंटेशन, मीटिंग, बिजनेस सेमीनार आदि में किया जाता है।

    2.3.3 डी.एल.पी. अथवा डिजिटल लाईट प्रोसेसिंग प्रोजेक्टर | DLP Projector | Digital Light Processing Projector:-

    इसमें एक चिप का उपयोग होता है, जिस पर हजारो छोटे-छोटे मिरर लगे होते है।

    इसका उपयोग फ्रंट तथा बेक प्रोजेक्शन के लिए किया जाता है।

    इसमें एक चिप के द्वारा कई सारे रंगो को प्रदर्शित किया जा सकता है।

    इसका उपयोग कई जगह प्रोजेक्टर के रूप में फ्रंट प्रोजेक्शन के लिए किया जाता है।

    इसके अलावा कई टी.वी. अथवा टेलीविजन में इसका उपयोग रिअर अथवा बेक प्रोजेक्शन के लिए भी किया जाता है।

    अन्य प्रकारः-

    लेजर प्रोजेक्टर | Laser Projector:-

    इस प्रकार के प्रोजेक्टर में प्रोजेक्टर से निकलने वाली लाईट की जगह पर लेजर बीम के रूप में आउटपुट को प्रोजेक्ट किया जाता है,

    जिससे इसकी इमेज क्वालिटी बहुत अच्छी होती है। वर्तमान में कई टी.वी. में इसका उपयोग किया जाता है।

    स्मार्ट प्रोजेक्टर | Smart Projector:-

    इस प्रकार के प्रोजेक्टर में मेमौरी तथा प्रोसेसर लगा होता है, जो अपनी मेमौरी में संरक्षित इमेज अथवा वीडियो को डिस्प्ले कर सकता है। 

    साथ ही इनमें एक ऑपरेटिंग सिस्टम होता है। 

    इन्हें इंटरनेट से कनेक्ट किया जा सकता है। ये लाइटवेट होते है, 

    तथा आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाए जा सकते है

    प्रोजेक्टर द्वारा आउटपुट के प्रोजेक्शन के प्रकारः-

    सामान्यतः सिनेमाघरो, क्लासरूम या ऐसी जगह जहां अधिक लोगो को एक साथ आउटपुट दिखाने की आवश्यकता होती है,

    ऐसी जगहों पर हमने प्रोजेक्टर का उपयोग होते देखा है, 

    जहां एक लाईट बीम के द्वारा स्क्रीन अथवा पर्दे पर आउटपुट दिखाया जाता है।

    हम देखते है कि कई बार यदि कोई ऑब्जेक्ट लाईट बीम और पर्दे के बीच आ जाता है, तो उसकी परछाई दिखाई देने लगती है।

    ऐसे में कई जगहों पर ऐसे प्रोजेक्टर का उपयोग किया जाता है, 

    जहां हमें लाईट बीम दिखाई नहीं देती है।

    प्रोजेक्टर की लोकेशन के आधार पर प्रोजेक्शन दो प्रकार के होते हैः-

    A. रिअर प्रोजेक्शन | Rear Projection:-

    इस प्रकार के प्रोजेक्शन में प्रोजेक्टर स्क्रीन के पीछे रखा होता है, 

    तथा स्क्रीन पर लाईट बीम के द्वारा हमें इमेज, वीडियों एवं अन्य आउटपुट दिखाई देते है, 

    क्योंकि हम स्क्रीन के सामने बैठे होते है,

    इसलिए हमें प्रोजेक्टर की लाईट दिखाई नहीं देती है। 

    रिअर प्रोजेक्शन के लिए सेमी-ट्रांसपेरेंट स्क्रीन की आवश्कता होती है।

    इसके द्वारा आउटपुट का प्रोजेक्शन करने पर इमेज क्वालिटी अच्छी दिखाई देती है, साथ ही इस पर अन्य लाईटो का कोई प्रभाव नहीं होता है।

    इसमें स्क्रीन के पीछे कुछ स्पेस की आवश्यकता होती है, 

    क्योंकि इसमें स्क्रीन के पीछे निश्चित दूरी पर प्रोजेक्टर को रखना होता है।

    इसका उपयोग कई जगहों पर किया जाता है।

    जैसे फिल्मों के कई सीन जैसे सड़क पर वाहन के चलाने का सीन अथवा पहाड़ो आदि के सीन को किसी रूम में ही रिअर प्रोजेक्शन का उपयोग करके बनाया जाता है।

    इनमें प्रोजेक्टर की लाईट बीम स्क्रीन के पीछे होती है, इस कारण यह रिअल लगती है।

    इसका सामान्यतः उपयोग बिजनिस परपस के लिए तथा आउटडोर प्रोजेक्ट के लिए (जहां अधिक जगह होती है) किया जाता है।

    B. फ्रंट प्रोजेक्शन | Front Projection:-

    इस प्रकार के प्रोजेक्शन में प्रोजेक्टर स्क्रीन के आगे रखा होता है।

    जैसा कि हम सिनेमाघरों में देखते है। सिनेमाघरों में जिस तरफ हम बैठे होते है,

    उसी तरफ से प्रोजेक्टर की लाईट बीम स्क्रीन पर पड़ती है, जिससे हमें आउटपुट दिखाई देता है,

    यही कारण है कि किसी व्यक्ति के लाईट बीम के सामने आने पर स्क्रीन पर उसकी परछाई दिखाई देने लगती है।

    इस प्रकार के प्रोजेक्शन के लिए किसी विशेष स्क्रीन की आवश्यकता नहीं होती है, 

    इसे सफेद दीवार अथवा किसी सफेद पर्दे पर भी चलाया जा सकता है।

    इस प्रकार के प्रोजेक्शन के लिए स्क्रीन के पीछे स्पेस की आवश्यकता नहीं होती है,

    क्योंकि इसमें प्रोजेक्टर सामने की ओर होता है।

    सामान्यतः इसका उपयोग अधिकांश जगहों पर किया जाता है।

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