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Computer Language

जिस प्रकार हम आपस में बात करने के लिए भाषा का प्रयोग करते है, उसी प्रकार कम्प्यूटर भी लैंग्वेज (Computer Language) के द्वारा विभिन्न डिवाईस जैसे इनपुटआउटपुट डिवाईस, कंट्रोल यूनिट, सी.पी.यू. आदि से डाटा का आदानप्रदान करता है।

कम्प्यूटर में कोई भी कार्य जैसे केलकुलेशन अथवा डिवाईस का कम्प्यूटर से कनेक्शन आदि प्रोग्राम अथवा साफ्टवेयर के माध्यम से संपादित होते है,

प्रोग्राम अथवा साफ्टवेयर क्रमबद्ध निर्देशों के समूह होते है, जो एक लैंग्वेज में लिखे होते है,

इसे कम्प्यूटर लैंग्वेज कहते है।

इस प्रकार हम कह सकते है कि कम्प्यूटर में सभी कार्य कम्प्यूटर लैंग्वेज के आधार पर ही संपादित होते है

फिर चाहे वह कोई केलकुलेशन हो या किसी डिवाईस का कम्प्यूटर से कनेक्शन हो जैसे कीबोर्ड अथवा माउस का कम्प्यूटर से कनेक्शन।

कम्प्यूटर के विकास के साथ ही कम्प्यूटर लैंग्वेज का विकास भी हुआ। 

प्रथम जनरेशन के कम्प्यूटर मशीन लैंग्वेज का उपयोग करते थे, द्वितीय जनरेशन के कम्प्यूटर असेंबली तथा हाईलेवल लैंग्वेज का प्रयोग करते थे

इसी प्रकार तृतीय जनरेशन के कम्प्यूटर हाई लेवल लैंग्वेज का उपयोग करते थे।

वर्तमान में देखा जाए तो कम्प्यूटर मानव की भाषा समझने में सक्षम है। 

उदाहरण के लिए हम वर्तमान में गूगल वॉईस रिकाग्निशन से परिचित है, जिसमें हम गूगल पर बोलकर कुछ भी सर्च कर सकते है। 

इस प्रकार के कम्प्यूटर पांचवी जनरेशन के कम्प्यूटर है।

प्रथम जनरेशन के कम्प्यूटर मानव भाषा को नहीं समझ सकते थे। 

यह केवल मशीन लैंग्वेज को ही समझ सकते थे।

1. लो लेवल लैंग्वेज | Low Level Computer Language:-

लॉ लैंग्वेज का मुख्य कार्य कम्प्यूटर के हार्डवेयर तथा विभिन्न हिस्सो के मध्य तालमेल बैठाना तथा आपस में डाटा तथा इन्स्ट्रक्शन का आदान-प्रदान करना है।

लो लेवल लैंग्वेज में लिखे गए प्रोग्राम बिना किसी इंटरप्रिटेशन अथवा ट्रांसलेटर के सीधे कम्प्यूटर पर रन हो सकते है।

इस भाषा में लिखा गया कोड हार्डवेयर तथा कम्प्यूटर में किए जाने वाले कार्यो को ध्यान में रखकर बनाया जाता था। 

निम्न भाषाएं लो लेवल लैंग्वेज (Low Level Computer Language) हैः-

1.1 मशीन लैंग्वेज | Machine Computer Language:-

मशीन लैंग्वेज सबसे पुरानी कम्प्यूटर लैंग्वेज है। इसे प्रथम जनरेशन की कम्प्यूटर लैंग्वेज भी कहते है।

मशीन लैंग्वेज में कम्प्यूटर को बाईनरी कोड अर्थात 0 तथा 1 के रूप में इनपुट दिया जाता है। 

कम्प्यूटर केवल मशीन लैंग्वेज अर्थात बाईनरी कोड 0 तथा 1 को ही समझता है।

यही कारण है कि मशीन लैंग्वेज में लिखा गया कोड कम्प्यूटर में सीधे रन हो सकता है, 

इसके लिए किसी लैंग्वेज ट्रांसलेटर अथवा कम्पाइलर अथवा इंटरप्रिटर की आवश्यकता नहीं होती है। 

मशीन लैंग्वेज को मशीन कोड अथवा ऑब्जेक्ट कोड के नाम से भी जाना जाता है।

इस लैंग्वेज को नेटिव लैंग्वेज भी कहा जाता है, क्योंकि यह सी.पी.यू. द्वारा सीधे ही समझी जा सकती है। 

मशीन लैंग्वेज को हमारे द्वारा समझा जाना बहुत कठिन है, क्योंकि इसमें कोड या प्रोग्राम लिखने के लिए बाईनरी कोड का उपयोग किया जाता है, जिसमें 0 तथा 1 का प्रयोग होता है।

1.2 असेंबली लैंग्वेज | Assambly Computer Language:-

असेंबली लैंग्वेज को द्वितीय जनरेशन की कम्प्यूटर लैंग्वेज भी कहते है। 

इस लैंग्वेज का उपयोग ऑपरेटिंग सिस्टम को लिखने तथा डेस्कटॉप एप्लिेकेशन को लिखने के लिए किया जाता है।

असेंबली भाषा के कोड को दुबारा उपयोग नहीं किया जा सकता है। 

साथ ही इस भाषा को सीखना कठिन होता है। 

असेंबली लैंग्वेज को असेंबली कोड भी कहते है। 

इस भाषा में लिखा गया कोड मशीन लैंग्वेज के कोड से आसान होता है। 

इसमें कोड अंग्रेजी में पढने योग्य लिखा जाता है।

प्रोसेसर में असेंबली लैंग्वेज का उपयोग बहुत ज्यादा होता है। 

असेंबली भाषा मे लिखे प्रोग्राम सीधे सी.पी.यू. में एक्जिक्यूट हो सकते है। 

इस लैंग्वेज में लिखे गए प्रोग्राम में कोई वेरिएबल अथवा फंक्शन का उपयोग नहीं होता है तथा इसके प्रोग्राम को दूसरे प्रोसेसरों में उपयोग नहीं किया जा सकता है।

असेंबली भाषा का स्ट्रक्चर तथा इसके कमांड मशीन लैंग्वेज के स्ट्रक्चर तथा कमांड जैसे ही लिखा जाता है, 

अंतर केवल इतना होता है कि इसमें बाईनरी कोड 0 तथा 1 के स्थाना पर नाम का उपयोग होता है। 

इस भाषा का कोड हाई लेवल लैंग्वेज में लिखे गए कोड से तेज गति से कार्य करता है।

कम्प्यूटर केवल मशीन लैंग्वेज समझता है, 

इसलिए इसमें लिखे कोर्ड को असेंबलर की मदद से असेंबली लैंग्वेज से मशीन लैंग्वेज में कन्वर्ट किया जाता है।

2. हाई लेवल लैंग्वेज | High Level Coputer Language:-

लो लेवल लैंग्वेज के उपयोग की सबसे बडी कमी यह थी कि इसमें एक मशीन अर्थात कम्प्यूटर हेतु लिखा गया कोड दूसरी मशीन अर्थात कम्प्यूटर पर उपयोग नहीं किया जा सकता था।

इसी कमी को दूर करते हुए हाई लेवल लैंग्वेज अपने अस्तित्व में आई। 

हाई लेवल लैंग्वेज के द्वारा प्रोग्रामरों को प्रोग्राम लिखने में मशीन लैंग्वेज पर निर्भर नहीं रहना होता है। 

हाई लेवल लैंग्वेज को समझना आसान होता है। साथ ही इसमें लिखे गए प्रोग्राम को आसानी से समझा जा सकता है।

जैसा कि हमने बात की हाई लेवल लैंग्वेज में एक मशीन पर कोड के रन होने की कमी को दूर किया गया। 

इस प्रकार हाई लेवल लैंग्वेज में एक कम्प्यूटर हेतु लिखा गया कोड दूसरे कम्प्यूटर पर आसानी से उपयोग किया जा सकता है। 

इस भाषा में कोड को लिखने के लिए हार्ड वेयर तथा कम्प्यूटर के कार्यो के बजाय प्रोग्रामिंग लैंग्वेज पर फोकस किया जाता है।

मानव के पढने योग्य तथा समझने योग्य कोड तथा प्रोग्रामिंग के लिए हाई लेवल लैंग्वेज का विकास किया गया था। 

लो लेवल लैंग्वेज में लिखे गए कोड की तुलना में हाई लेवल लैंग्वेज में लिखे गए प्रोग्राम को समझना आसान है।

हाई लेवल लैंग्वेज में लिखे गए प्रोग्राम को कम्प्यूटर नहीं समझ सकता है, क्योंकि कम्प्यूटर केवल मशीन लैंग्वेज अर्थात बाइनरी कोड 0 तथा 1 को समझता है। 

इसलिए हाई लेवल लैंग्वेज तथा कम्प्यूटर के बीच एक कन्वर्टर का प्रयोग किया जाता है, जिसे कम्पाइलर कहते है।

कम्प्लाइलर हाई लेवल लैंग्वेज में लिखे गए कोड को मशीन लैंग्वेज के कोड में बदल देता है। 

हाई लेवल लैंग्वेज जैसे C, C++, JAVA, FORTRAN, Pascal, Perl, Ruby, and Visual Basic.

लैंग्वेज ट्रांसलेटरः-

हमने ऊपर पढ़ा कि कम्प्यूटर केवल मशीन लैंग्वेज अर्थात बाईनरी कोर्ड 0 तथा 1 को ही समझता है। 

मशीन लैंग्वेज में लिखा गया कोड सीधे ही कम्प्यूटर पर रन हो सकता है। 

साथ ही हमने अन्य दो लैंग्वेज असेंबली तथा हाई लेवल लैंग्वेज के बारे में भी पढ़ा।

अब यदि प्रोग्राम का कोड असेंबली लैंग्वेज अथवा हाई लेवल लैंग्वेज में लिखा गया है तो उसे कम्प्यूटर पर चलाने हेतु मशीन लैंग्वेज में बदलने की आवश्यकता होती है।

इस कार्य के लिए हम ट्रांसलेटर का उपयोग करते है। 

यहां निम्न तीन प्रकार के कम्प्यूटर लैंग्वेज ट्रांसलेटर के बारे में जानेंगेः

असेंबलर:-

असेंबली लैंग्वेज के कोड को मशीन लैंग्वेज में मदलने के लिए असेंबलर का उपयोग किया जाता है।

कम्पाइलर:-

हाई लेवल लैंग्वेज के कोड को मशीन लैंग्वेज में बदलने के लिए कम्पाइलर का उपयोग किया जाता है।

कम्पाइलर रन किए गए पूरे प्रोग्राम को पढता है, तथा कोई गलती अर्थात इरर आने पर उसकी जानकारी देता है।

हर हाई लेवल लैंग्वेज के लिए अलग कम्पाईलर की आवश्यकता होती है।

इंटरप्रिटर:-

इंटरप्रिटर भी हाई लेवल लैंग्वेज के कोड को मशीन लैंग्वेज में बदलने का कार्य करता है।

कम्पाइलर से इसका अंतर यह है कि यह हाई लेवल लैंग्वेज में लिखे गए कोड को एक ही बारे में पूरा पढ़ने की बजाय लाईन बाय लाईन पढ़ता है,

तथा किसी लाईन में कोई गलती अर्थात इरर आने पर जानकारी देता है,

तथा प्रोग्राम रन होना बंद हो जाता है तथा तब तक प्रोग्राम आगे रन नहीं होता है,

जब तक इरर को ठीक न कर दिया जावे।

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